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ग्रन्थ

भगवद गीता(77)

भगवद गीता पर शास्त्रीय व्याख्या, कथा, अर्थ, शिक्षाएँ और प्रश्नोत्तर — कुल 77 प्रश्न उपलब्ध हैं।

भक्ति एवं आध्यात्म

भगवान से क्या माँगना चाहिए और क्या नहीं?

माँगें — विवेक, भक्ति, शक्ति, क्षमा, दूसरों का कल्याण। धन-सफलता माँगना बुरा नहीं — पर 'जो उचित हो वो दो' के भाव से। न माँगें — किसी को नुकसान, अहंकार की पूर्ति। सर्वश्रेष्ठ माँग — 'अपने चरणों में भक्ति दो।'

#भगवान से माँगना#प्रार्थना#भक्ति
लोक

गीता में स्वर्लोक को 'बैंक खाते' जैसा क्यों कहा जाता है?

गीता (9.21) के अनुसार स्वर्ग में जमा पुण्य खर्च होते रहते हैं और समाप्त होने पर वापसी होती है — ठीक बैंक खाते की तरह। पुण्य = बैलेंस, स्वर्ग = सुविधाएं, पुण्य खाली = निष्कासन।

#गीता#स्वर्लोक#पुण्य
लोक

स्वर्लोक और मोक्ष में क्या फर्क है?

स्वर्लोक अस्थायी है — पुण्य क्षीण होने पर वापस आना पड़ता है। मोक्ष स्थायी है — वहाँ से कोई नहीं लौटता। गीता कहती है 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।'

#स्वर्लोक#मोक्ष#फर्क
लोक

स्वर्लोक कितने समय तक रहा जा सकता है?

स्वर्लोक में जितने पुण्य उतने समय। गीता (9.21) कहती है — पुण्य क्षीण होने पर पुनः पृथ्वी पर लौटना पड़ता है। यह अस्थायी निवास है।

#स्वर्लोक#समय#पुण्य
लोक

यज्ञ करने से स्वर्ग मिलता है क्या?

हाँ, यज्ञ स्वर्ग प्राप्ति का प्रमुख मार्ग है। स्वयं इन्द्र ने 100 यज्ञों से स्वर्ग प्राप्त किया। लेकिन यह स्वर्ग पुण्य क्षीण होने पर समाप्त हो जाता है।

#यज्ञ#स्वर्ग#इन्द्र
आहार धर्म

राजसिक और तामसिक भोजन में क्या अंतर?

राजसिक(गीता 17.9): तीखा/नमकीन/गर्म=चंचल/क्रोध। तामसिक(17.10): बासी/मांस/शराब=आलस्य/जड़ता। राजसिक=उत्तेजक, तामसिक=सुस्त, सात्विक=संतुलित। Junk=तामसिक, Spicy=राजसिक, Fresh=सात्विक।

#राजसिक#तामसिक#अंतर
महाभारत

संजय को दिव्य दृष्टि किसने दी?

संजय को दिव्य दृष्टि महर्षि वेदव्यास ने दी थी ताकि वे कुरुक्षेत्र का युद्ध हस्तिनापुर में बैठे धृतराष्ट्र को सुना सकें। धृतराष्ट्र ने स्वयं दिव्य दृष्टि लेने से यह कहकर मना किया था कि वे अपने स्वजनों को लड़ते नहीं देख सकते।

#संजय#दिव्य दृष्टि#वेदव्यास
गीता ज्ञान

गीता का कौन सा अध्याय पढ़ने से कौन सा फल?

गीता महात्म्य (पद्म/वराह पुराण): प्रत्येक अध्याय का विशेष फल। 12वाँ (भक्ति) और 15वाँ (पुरुषोत्तम) विशेष महत्वपूर्ण। 18वाँ अध्याय = मोक्ष/शरणागति। सम्पूर्ण पाठ सर्वोत्तम। 'गीता सुगीता कर्तव्या' — गीता ही पर्याप्त।

#गीता अध्याय#फल#गीता महात्म्य
लोक

भुवर्लोक में रहने वाली आत्माओं की त्रिगुणात्मक स्थिति क्या होती है?

ऊपरी भुवर्लोक के सिद्धादि रजो-सात्त्विक हैं जबकि निचले भुवर्लोक के प्रेतादि तमोगुण प्रधान हैं। दोनों ही पूर्णतः सत्वगुणी न होने से मोक्ष नहीं पाते।

#त्रिगुण#भुवर्लोक#सत्व रज तम
लोक

भुवर्लोक का जीव पुनः पृथ्वी पर क्यों लौटता है?

गीता के अनुसार सभी लोक पुनरावर्ती हैं। भुवर्लोक में पुण्य और सिद्धियाँ क्षीण होने पर त्रिगुणात्मक बंधन के कारण जीव को पुनः पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है।

#भुवर्लोक#पुनर्जन्म#पृथ्वी
गीता ज्ञान

गीता श्लोक 9.22 — अनन्याश्चिन्तयन्तो मां — अर्थ क्या?

गीता 9.22: 'जो अनन्य भाव से मेरा निरंतर चिंतन करते हैं, उनका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।' योग = अप्राप्त की प्राप्ति, क्षेम = प्राप्त की रक्षा। 'वहामि अहम्' = मैं स्वयं करता हूँ। शर्त: अनन्य भक्ति।

#गीता 9.22#अनन्य भक्ति#योगक्षेम
धर्म ज्ञान

जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था में क्या अंतर?

वर्ण = गुण-कर्म आधारित (गीता 4.13), 4 वर्ण, परिवर्तनीय। जाति = जन्म आधारित, हजारों उप-जातियाँ, अपरिवर्तनीय। जाति व्यवस्था वर्ण की विकृति है। गीता: 'चातुर्वर्ण्यं गुणकर्मविभागशः' — जन्म से नहीं, गुण-कर्म से।

#जाति#वर्ण#अंतर
गीता ज्ञान

गीता श्लोक 18.66 — सर्वधर्मान्परित्यज्य — अर्थ क्या?

गीता 18.66 (चरम श्लोक): 'सब छोड़कर मेरी शरण आ, मैं तुझे सभी पापों से मुक्त करूँगा, शोक मत कर।' रामानुज: गीता का सर्वोच्च श्लोक — प्रपत्ति (शरणागति) का परम उपदेश। गीता का सबसे आश्वस्त करने वाला वचन।

#गीता 18.66#शरणागति#चरम श्लोक
भगवद गीता

गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक कौन सा है?

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। (गीता 2.47) — कर्म करो, फल की चिंता मत करो। यही कर्म योग का सार है। सर्वाधिक प्रसिद्ध, उद्धृत और प्रासंगिक श्लोक। अन्य प्रमुख: 4.7 (अवतार), 18.66 (शरणागति)।

#गीता#प्रसिद्ध श्लोक#कर्मण्येवाधिकारस्ते
भगवद गीता

गीता में ज्ञान योग क्या है?

ज्ञान योग = आत्मा-ब्रह्म के यथार्थ बोध से मोक्ष। विचारकों के लिए। स्थितप्रज्ञ अवस्था — कामना-भय-क्रोध से मुक्त। क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का विवेक (अध्याय 13)। 'सर्वकर्म ज्ञान में परिसमाप्त होते हैं' (4)। समदर्शिता — सभी में ईश्वर दर्शन।

#ज्ञान योग#गीता#आत्मज्ञान
भगवद गीता

गीता में भक्ति योग क्या है?

भक्ति योग = श्रद्धा और प्रेम से ईश्वर की उपासना। गीता अध्याय 12 — श्रीकृष्ण ने सगुण भक्ति को सर्वोत्तम बताया। देहधारी के लिए सगुण उपासना सहज। भक्त के लक्षण: समभाव, संतोष, निर्द्वंद्व। भक्ति की सीढ़ियाँ: अभ्यास → ज्ञान → ध्यान → फलत्याग → परम शांति।

#भक्ति योग#गीता#अध्याय 12
भगवद गीता

गीता में कर्म योग क्या है?

कर्म योग = फल की आसक्ति त्याग कर कर्तव्य-पालन। 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' (2.47)। कोई एक क्षण कर्म-रहित नहीं रह सकता। निष्काम कर्म = मुक्ति। सकाम कर्म = बंधन। 'योगः कर्मसु कौशलम्' — कर्म में कुशलता ही योग।

#कर्म योग#निष्काम कर्म#गीता
भगवद गीता

भगवद गीता का संदेश क्या है?

गीता का केंद्रीय संदेश: कर्म करो, फल की चिंता मत करो (2.47)। आत्मा अमर है। स्वधर्म श्रेष्ठ। कर्म योग + ज्ञान योग + भक्ति योग — तीनों मोक्ष-मार्ग। सुख-दुख में समभाव। अंतिम उपाय — ईश्वर की शरण (18.66)। 18 अध्याय, 700 श्लोक।

#गीता#संदेश#कर्म
गीता ज्ञान

गीता के 15वें अध्याय — पुरुषोत्तम योग क्या है?

अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग — 20 श्लोक): संसार = उल्टा अश्वत्थ वृक्ष। जीवात्मा ईश्वर का अंश (15.7)। तीन पुरुष: क्षर (नाशवान), अक्षर (अविनाशी), पुरुषोत्तम (सर्वोच्च परमात्मा)। 'इसे जानने वाला सर्वज्ञ' (15.19-20)। गीता का सबसे गोपनीय अध्याय।

#पुरुषोत्तम योग#गीता 15#अश्वत्थ वृक्ष
आध्यात्मिक साधना

आध्यात्मिक साधना में कामना का त्याग क्यों आवश्यक है?

कामना त्याग: गीता 3.37 — 'काम=सर्वभक्षी शत्रु।' कामना→आसक्ति→क्रोध→मोह→बुद्धि नाश (2.62-63)। कामना=बंधन+अशांति+अहंकार। गीता 2.47: 'फल की कामना न करो।' त्याग≠इच्छा-रहित, ✅अनासक्ति ('भगवान जो दें=श्रेष्ठ')। स्थितप्रज्ञ: सभी कामना त्याग→आत्मा में तृप्त। क्रमिक प्रक्रिया।

#कामना त्याग#निष्काम#अनासक्ति
गीता ज्ञान

गीता का सबसे महत्वपूर्ण श्लोक कौन सा है?

सर्वाधिक प्रसिद्ध: 2.47 (कर्मण्येवाधिकारस्ते — कर्मयोग)। सर्वोच्च उपदेश: 18.66 (सर्वधर्मान् परित्यज्य — शरणागति, रामानुज का 'चरम श्लोक')। अन्य: 4.7 (अवतार), 2.48 (समत्वं योग), 4.36 (ज्ञानाग्नि)। उत्तर मार्ग पर निर्भर।

#गीता श्लोक#महत्वपूर्ण#कर्मयोग
भगवद गीता

गीता के तीसरे अध्याय कर्मयोग का सारांश क्या है

तीसरा अध्याय निष्काम कर्म का उपदेश देता है। कर्म अनिवार्य है; फल की आसक्ति छोड़कर यज्ञ भावना से करें। लोकसंग्रह के लिए ज्ञानी को भी कर्म जरूरी। काम ही सबसे बड़ा शत्रु।

#गीता#कर्मयोग#तीसरा अध्याय
ग्रंथ मार्गदर्शन

भगवद्गीता समझने के लिए सबसे अच्छी किताब — हिंदी?

शुरुआत: गीता प्रेस(₹30-50), रामसुखदास 'साधक संजीवनी'। मध्यम: प्रभुपाद, चिन्मयानंद। उन्नत: शंकर भाष्य, अरविंद। सरलतम=गीता प्रेस।

#गीता#किताब#हिंदी
सनातन दर्शन

हिंदू धर्म में समानता का सिद्धांत क्या है?

वेद-उपनिषद का संदेश — 'एकं सत्', 'अहं ब्रह्मास्मि', 'तत्त्वमसि' — सभी जीवों में एक ही आत्मा। गीता में समदर्शन। वर्ण गुण-कर्म पर आधारित, जन्म पर नहीं। भक्ति परंपरा में शबरी, कबीर, रैदास जैसे उदाहरण।

#समानता#सनातन धर्म#वेद
श्रीमद्भागवत

भीष्म स्तुति में गीता का प्रसंग क्या है?

भीष्म स्तुति में गीता का प्रसंग अर्जुन का मोह दूर करने और कृष्ण के पार्थसारथी रूप को दिखाने के लिए आता है।

#भीष्म स्तुति#गीता#अर्जुन
लोक

अष्टमी श्राद्ध में गीता का कौन सा अध्याय पढ़ें?

गीता का आठवां अध्याय।

#गीता#अष्टम अध्याय#अष्टमी श्राद्ध
लोक

पिण्डोदक क्रिया क्यों जरूरी है?

पिण्डोदक क्रिया पितरों की रक्षा और तृप्ति के लिए जरूरी है।

#पिण्डोदक क्रिया#गीता#पितरों का पतन
लोक

अर्यमा पितरों के अधिपति क्यों माने जाते हैं?

अर्यमा देव पितरों के अधिपति हैं और गीता में श्रीकृष्ण ने उन्हें पितरों में अपनी विभूति कहा है।

#अर्यमा#देव पितर#पितरों के अधिपति
लोक

सत्यलोक से वापसी होती है क्या?

सकाम कर्मी के लिए वापसी हो सकती है। पर निष्काम योगी और भक्त सत्यलोक से नहीं लौटते — वे महाप्रलय में ब्रह्मा के साथ मोक्ष पाते हैं।

#सत्यलोक#वापसी#पुनर्जन्म
जीवन एवं मृत्यु

क्या जीवात्मा पुनर्जन्म लेती है?

हाँ, जीवात्मा पुनर्जन्म लेती है। भगवद्गीता, गरुड़ पुराण और कठोपनिषद सभी इसकी पुष्टि करते हैं। कर्मों और अंतिम विचारों के आधार पर अगला जन्म निर्धारित होता है। मोक्ष प्राप्ति पर यह चक्र समाप्त होता है।

#पुनर्जन्म#जीवात्मा#कर्म
भक्ति एवं आध्यात्म

आत्मा अमर है — इसका प्रमाण क्या है?

गीता (2.20) और कठोपनिषद में स्पष्ट कहा गया है — आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और अविनाशी है। शरीर के नाश होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।

#आत्मा अमर#गीता#उपनिषद
भक्ति एवं आध्यात्म

त्रिगुण क्या हैं — सत्त्व, रजस, तमस?

सत्त्व (पवित्रता-ज्ञान), रजस (क्रिया-इच्छा) और तमस (अज्ञान-आलस्य) — ये तीन गुण प्रकृति की मूल प्रवृत्तियाँ हैं जो हर जीव के स्वभाव और कर्म को प्रभावित करती हैं।

#त्रिगुण#सत्त्व#रजस
भक्ति एवं आध्यात्म

कर्म सिद्धांत क्या है सरल भाषा में?

शरीर, वाणी और मन से की गई प्रत्येक क्रिया कर्म है। शुभ कर्म सुख देते हैं, अशुभ दुख। गीता का उपदेश है — फल की आसक्ति छोड़कर निष्काम भाव से कर्म करो।

#कर्म सिद्धांत#कर्मफल#गीता
महाभारत

कृष्ण ने अर्जुन को गीता क्यों सुनाई?

कुरुक्षेत्र में युद्ध से पहले अर्जुन अपने स्वजनों को देखकर मोह और शोक में डूब गए और युद्ध करने से इनकार कर बैठे। उनके इस अज्ञानजनित मोह को दूर करने और धर्म के सही स्वरूप को समझाने के लिए श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया।

#गीता#कृष्ण#अर्जुन
गृहस्थ धर्म

अंतिम समय गीता कौन सा श्लोक सुनाएं

गीता 8.5 (अंतिम स्मरण=गति), 18.66 ('शरण आजा=मुक्त'), 2.22 (शरीर=कपड़े)। 'राम'/महामृत्युंजय जप। गंगाजल। शांत वातावरण; रोएं नहीं (आत्मा सुनती)।

#अंतिम समय#गीता#श्लोक
आधुनिक धर्म प्रश्न

भगवद्गीता हिंदी सबसे अच्छी किताब

शुरुआत: गीता प्रेस (₹20-50)। गहन: रामसुखदास/चिन्मयानंद। ISKCON: प्रभुपाद। Daily 1 श्लोक।

#गीता#हिंदी#किताब
हिंदू दर्शन

संन्यास लिए बिना मोक्ष मिल सकता है क्या

हाँ — गीता 5.2-6 'कर्मयोगो विशिष्यते' (कर्म योग संन्यास से श्रेष्ठ)। राजा जनक = गृहस्थ, जीवनमुक्त। असली संन्यास = आसक्ति का आंतरिक त्याग, गेरुआ वस्त्र नहीं। गृहस्थ रहकर निष्काम कर्म + भक्ति + वैराग्य = मोक्ष।

#संन्यास#मोक्ष#गृहस्थ
हिंदू दर्शन

चार वर्ण कैसे बने मूल उद्देश्य क्या था

गीता 4.13 — वर्ण गुण-कर्म से, जन्म से नहीं। मूल उद्देश्य: सामाजिक श्रम विभाजन — ब्राह्मण (ज्ञान), क्षत्रिय (रक्षा), वैश्य (अर्थ), शूद्र (सेवा)। महाभारत — 'कर्म से ब्राह्मण, जाति से नहीं।' जन्म आधारित जाति = मूल सिद्धांत की विकृति, शास्त्रीय आदेश नहीं।

#वर्ण#चातुर्वर्ण्य#गीता
हिंदू दर्शन

स्थितप्रज्ञ कौन होता है गीता के अनुसार

स्थितप्रज्ञ (गीता 2.55-72): सब कामनाएं त्यागकर आत्मा में संतुष्ट (2.55); दुःख-सुख-राग-भय-क्रोध से मुक्त (2.56); कछुआ जैसे इंद्रियां समेटे (2.58); समुद्र जैसे अचल — कामनाएं आएं पर विचलित न करें (2.70)। सार: भीतर शांत, बाहर कुछ भी हो।

#स्थितप्रज्ञ#गीता#लक्षण
हिंदू दर्शन

कृष्ण ने महाभारत में युद्ध क्यों करवाया अहिंसा उल्लंघन

पूरा श्लोक: 'अहिंसा परमो धर्मः, धर्महिंसा तथैव च' — धर्म हेतु हिंसा भी धर्म। कृष्ण ने पहले सब शांति प्रयास किए (5 गांव भी नहीं मिले)। गीता 2.31 — क्षत्रिय का धर्म = अन्याय से लड़ना। अन्याय सहना = कायरता, अहिंसा नहीं।

#कृष्ण#युद्ध#अहिंसा
हिंदू दर्शन

गीता पढ़ने से जीवन में क्या लाभ होता है

गीता लाभ: मृत्यु भय मुक्ति, शोक-मोह निवृत्ति, तनाव प्रबंधन (समभाव 2.48), कर्म प्रेरणा, निर्णय विवेक, मन शांति, असफलता से निर्भयता (फल आसक्ति नहीं)। गांधी ने 'गीता माता' कहा। यह धार्मिक ग्रंथ नहीं, जीवन प्रबंधन का सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक है।

#गीता#लाभ#जीवन
हिंदू दर्शन

गीता में कृष्ण ने मन को वश में करना कैसे बताया

गीता 6.35 — अभ्यास + वैराग्य से मन वश होता है। अभ्यास = बार-बार मन को विषयों से हटाकर ध्येय पर लाना (6.26)। वैराग्य = विषय भोगों से विरक्ति। सहायक: ध्यान, इंद्रिय निग्रह (कछुआ उदाहरण), सात्विक आहार, ईश्वर शरणागति।

#मन#वश#गीता
हिंदू दर्शन

गीता के 18 अध्यायों का सारांश क्या है

गीता 18 अध्याय = 3 खंड: कर्म (1-6), भक्ति (7-12), ज्ञान (13-18)। मुख्य: अर्जुन का शोक → आत्मा अमर → कर्म करो फल छोड़ो → अवतार → ध्यान → भक्ति → विश्वरूप → गुण-विभाग → अंतिम उपदेश 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' (18.66)।

#गीता#18 अध्याय#सारांश
हिंदू दर्शन

यदा यदा हि धर्मस्य श्लोक का अर्थ क्या है

गीता 4.7-8 — जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब भगवान प्रकट होते हैं — सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म स्थापना के लिए — प्रत्येक युग में। यह अवतारवाद का मूल सिद्धांत और शाश्वत आश्वासन है।

#गीता#श्लोक#अवतार
हिंदू दर्शन

कर्मण्येवाधिकारस्ते श्लोक का सही अर्थ क्या है

गीता 2.47 — (1) कर्म करना तुम्हारे हाथ में है (2) फल तुम्हारे नियंत्रण में नहीं (3) फल की लालसा कर्म का कारण न बने (4) 'फल नहीं तो कर्म क्यों' — यह सोच भी गलत। सार: पूर्ण समर्पण से कर्म करो, परिणाम ईश्वर पर छोड़ो।

#गीता#कर्मण्येवाधिकारस्ते#कर्म
हिंदू दर्शन

भगवद्गीता के अनुसार निष्काम कर्म क्या है

निष्काम कर्म = फल की आसक्ति बिना कर्तव्य कर्म। गीता 2.47 — कर्म करो, फल में आसक्ति मत रखो। कर्म ईश्वर को अर्पित (9.27), सुख-दुख में समान (2.48)। आलस्य नहीं — पूर्ण समर्पण से कर्म करो, फल ईश्वर पर छोड़ो। परिणाम: चित्त शुद्धि → मोक्ष।

#निष्काम कर्म#गीता#कर्म योग
हिंदू दर्शन

वासांसि जीर्णानि श्लोक का अर्थ क्या है

गीता 2.22 — जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र बदलकर नए पहनता है, वैसे ही आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया धारण करती है। तात्पर्य: मृत्यु = वस्त्र बदलना; शरीर नाशवान, आत्मा शाश्वत। मृत्यु का भय अज्ञानता है।

#गीता#वासांसि जीर्णानि#आत्मा
आत्मा और मोक्ष

मोक्ष प्राप्ति के चार मार्ग कौन से हैं

चार मार्ग: ज्ञान योग (आत्म-ज्ञान — शंकराचार्य), भक्ति योग (ईश्वर समर्पण — गीता 12.6), कर्म योग (निष्काम कर्म — गीता 2.47), राज योग (ध्यान-समाधि — पतंजलि)। ये परस्पर पूरक हैं। गीता 18.66 — भगवान की शरण = सर्वपाप मुक्ति।

#मोक्ष#चार मार्ग#योग
आत्मा और मोक्ष

गीता में पुनर्जन्म के बारे में क्या कहा गया है

गीता में पुनर्जन्म का स्पष्ट वर्णन: 2.13 (देहांतर प्राप्ति), 2.20 (आत्मा अजन्मा), 2.22 (वस्त्र बदलना), 4.5 (बहुत जन्म), 8.6 (अंतिम भाव = अगला जन्म), 15.8 (वायु-सुगंध उदाहरण)। मुक्ति: गीता 8.15 — भगवान प्राप्ति पर पुनर्जन्म नहीं।

#गीता#पुनर्जन्म#कृष्ण
आत्मा और मोक्ष

भगवद्गीता के अनुसार आत्मा अमर है कैसे समझें

गीता 2.20 — आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत। 2.23 — शस्त्र, अग्नि, जल, वायु कुछ नहीं कर सकते। 2.22 — शरीर बदलता है, आत्मा नहीं (वस्त्र उदाहरण)। 2.25 — अव्यक्त, अचिंत्य, अविकारी। सरल अर्थ: शरीर = बर्तन, आत्मा = आकाश — बर्तन टूटे तो आकाश नष्ट नहीं।

#आत्मा#अमर#गीता
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