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आत्मा अमर है — इसका प्रमाण क्या है?

गीता (2. 20) और कठोपनिषद में स्पष्ट कहा गया है — आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और अविनाशी है।

संक्षिप्त उत्तर

गीता (2.20) और कठोपनिषद में स्पष्ट कहा गया है — आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और अविनाशी है। शरीर के नाश होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।

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विस्तृत उत्तर

आत्मा की अमरता सनातन दर्शन का सबसे मूलभूत सत्य है। इसके प्रमाण वेद, उपनिषद और भगवद्गीता तीनों में स्पष्ट रूप से मिलते हैं।

भगवद्गीता (2.20) का यह श्लोक सबसे प्रामाणिक है — 'न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायम् भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।' अर्थात — यह आत्मा न कभी जन्मती है, न मरती है; यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।

कठोपनिषद में यमराज नचिकेता को बताते हैं — 'न जायते म्रियते वा विपश्चित् — यह आत्मा न जन्मती है, न मरती है।' बृहदारण्यक उपनिषद में भी आत्मा को 'अजर-अमर' कहा गया है।

गीता (2.22) का उदाहरण भी प्रसिद्ध है — 'जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करता है।'

दार्शनिक दृष्टि से भी — आत्मा चेतना है। चेतना ऊर्जा का एक स्वरूप है और ऊर्जा न तो बनाई जा सकती है, न नष्ट की जा सकती है — केवल उसका रूप बदलता है। यही विज्ञान के ऊर्जा संरक्षण के नियम से भी मेल खाता है।

शरीर नश्वर है, लेकिन उस शरीर को जीवंत बनाने वाली चेतना — आत्मा — अमर और अविनाशी है।

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