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विस्तृत उत्तर
भस्मासुर की तपस्या कई दिनों तक अत्यंत भयानक रूप में चली। कथा में बताया गया है कि उसने छह दिनों तक अपने शरीर का मांस काट-काटकर अग्नि में अर्पित किया। उसका शरीर लगभग कंकाल जैसा हो गया, फिर भी शिव जी प्रकट नहीं हुए। सातवें दिन उसका धैर्य टूट गया और उसने निश्चय किया कि अब वह अपना सिर ही अग्नि में चढ़ा देगा। वह स्नान करके कुल्हाड़ी से अपना सिर काटने ही वाला था कि भगवान शिव करुणा से प्रकट हुए। इसलिए इस कथा में सातवें दिन शिव जी का प्राकट्य निर्णायक मोड़ बनता है।
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