विस्तृत उत्तर
ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग — दोनों मोक्ष के पथ हैं, किंतु दोनों की प्रकृति और साधना विधि अलग है।
ज्ञान मार्ग — इसमें साधक बुद्धि और विवेक के द्वारा आत्मा और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करता है। 'मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ' — 'यह जगत माया है' — 'ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है' — इन तथ्यों की गहरी अनुभूति ही ज्ञान मार्ग की उपलब्धि है। शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में इसकी सर्वोच्च व्याख्या मिलती है। इस मार्ग में वैराग्य, विवेक, मुमुक्षा और शम-दम जैसी साधनचतुष्टय की आवश्यकता होती है।
भक्ति मार्ग — इसमें साधक ईश्वर से प्रेम, विश्वास और समर्पण के द्वारा मुक्ति पाता है। ज्ञान नहीं, प्रेम यहाँ साधन है। भगवान से अपना संबंध स्थापित करना — माँ, पिता, मित्र, स्वामी या प्रेमी के रूप में — और उस संबंध में डूब जाना ही भक्ति है। नामदेव, मीरा, तुकाराम, चैतन्य महाप्रभु — ये इसी मार्ग के पथिक थे।
मुख्य अंतर — ज्ञान मार्ग में 'अहं ब्रह्मास्मि' — मैं और ब्रह्म एक हैं — यह बोध लक्ष्य है; भक्ति मार्ग में भक्त और भगवान का पृथकत्व बनाए रखते हुए उनके प्रेम में लीन होना लक्ष्य है। एक तर्क और विचार का मार्ग है, दूसरा हृदय और प्रेम का।
वास्तव में ये दोनों पूरक हैं — गीता में श्रीकृष्ण ने दोनों को मान्यता दी है। ज्ञान के बिना भक्ति अंधी हो सकती है, और भक्ति के बिना ज्ञान रूखा।





