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विस्तृत उत्तर
हिरण्यकशिपु और रावण का संबंध जय-विजय के जन्मों से है। दोनों अलग-अलग युगों में जय के असुर जन्म माने जाते हैं। सत्ययुग में जय हिरण्यकशिपु के रूप में जन्मा और त्रेता युग में वही जय रावण बना। दोनों में भगवान विष्णु के प्रति विरोध, शक्ति का अहंकार और अधर्म की दिशा दिखाई देती है। फिर भी दोनों का अंत भगवान के अवतारों से हुआ, जिससे जय का श्राप क्रमशः समाप्त होता गया।
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