विस्तृत उत्तर
जालंधर का जन्म भगवान शिव की क्रोधाग्नि से हुआ। कथा के अनुसार, इंद्र अपने अहंकार में कैलाश जाते समय शिव को अवधूत रूप में पहचान नहीं पाए और उन पर वज्र उठाने लगे। इससे शिव का तीसरा नेत्र क्रोध से प्रज्वलित हुआ और उससे भयंकर अग्नि निकली। देवगुरु बृहस्पति की प्रार्थना पर शिव ने इंद्र को क्षमा कर दिया, पर उत्पन्न अग्नि को वापस नहीं लिया जा सकता था। शिव ने उस तेज को समुद्र में डाल दिया। समुद्र के जल में वह अग्नि एक प्रचंड बालक के रूप में प्रकट हुई, जिसे आगे चलकर जालंधर कहा गया।
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