विस्तृत उत्तर
जीवन्मुक्त वह व्यक्ति है जो शरीर में रहते हुए भी देह-अभिमान से मुक्त हो चुका है। हंस गीता में बताया गया है कि आत्मज्ञानी पुरुष शरीर की स्थिति से अधिक प्रभावित नहीं होता। वह जानता है कि शरीर प्रारब्ध कर्म से चल रहा है, पर मैं शरीर नहीं हूँ। जैसे जागा हुआ व्यक्ति स्वप्न को झूठा जानता है, वैसे ही जीवन्मुक्त संसार के सुख-दुख को अंतिम सत्य नहीं मानता। वह मन, इंद्रिय और विषयों को देखता है, पर उनसे बंधता नहीं। उसका आनंद भीतर के आत्मस्वरूप में स्थिर रहता है। यही देह में रहते हुए मुक्त अवस्था है।
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