विस्तृत उत्तर
काव्या माता के वध के समय शुक्राचार्य आश्रम में उपस्थित नहीं थे। वे मृत संजीवनी विद्या प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की तपस्या में गए हुए थे। जब वे लौटे और उन्हें पता चला कि उनकी माता का वध भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से हुआ था, तो उनके मन में देवताओं और विष्णु के प्रति गहरा रोष उत्पन्न हुआ। यद्यपि भृगु ऋषि ने काव्या माता को पुनर्जीवित कर दिया था, फिर भी घटना की पीड़ा मिट नहीं सकी। इसके बाद शुक्राचार्य ने असुरों का पक्ष और दृढ़ता से लिया तथा मृत संजीवनी विद्या से उन्हें बार-बार पुनर्जीवित किया।
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