विस्तृत उत्तर
भगवान का ग्यारहवाँ अवतार कच्छप या कूर्म रूप में बताया गया है। जब देवता और दैत्य समुद्र मंथन कर रहे थे, तब भगवान ने कच्छप रूप धारण किया। इस रूप में उन्होंने मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया। पाठ में यहाँ समुद्र मंथन की पूरी कथा नहीं आती, लेकिन कूर्म अवतार का मुख्य कार्य स्पष्ट है: मंथन के आधार के रूप में पर्वत को संभालना। मंदराचल के स्थिर आधार के बिना समुद्र मंथन संभव नहीं था। इसलिए कूर्म अवतार भगवान की वह लीला है जिसमें वे विश्व-कार्य सिद्ध करने के लिए आधार, धारण-शक्ति और स्थिरता का रूप बनते हैं।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





