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विस्तृत उत्तर
मृत्यु के बाद स्थूल शरीर का दाह होने पर जीवात्मा वायव्य सूक्ष्म शरीर धारण करती है। जब तक उसका सपिण्डीकरण नहीं होता, तब तक वह प्रेत अवस्था में मानी जाती है। सपिण्डीकरण में प्रेत-पिण्ड को पितृ-पिण्डों के साथ मिलाया जाता है। इसी प्रक्रिया से जीवात्मा प्रेत योनि से मुक्त होकर पितृ पद प्राप्त करती है और पार्वण श्राद्ध की अधिकारिणी बनती है।
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