विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण के अनुसार एक सच्चे योगी को तृप्त करना हजार साधारण ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य देता है।
नवमी श्राद्ध में योगी को भोजन कराने का फल क्या है को संदर्भ सहित समझें
नवमी श्राद्ध में योगी को भोजन कराने का फल क्या है का सबसे सीधा सार यह है: हजार ब्राह्मण भोजन के समान फल।
लोक जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
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इसी विषय के 5 प्रश्न
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त्रयोदशी श्राद्ध में योगी को भोजन कराने का फल क्या है?
हजार ब्राह्मण भोजन से भी श्रेष्ठ।
विष्णु पुराण और भागवत पुराण में महर्लोक के वर्णन में क्या अंतर है?
विष्णु पुराण महर्लोक की कृतकाकृतक प्रकृति और प्रलय-विज्ञान पर बल देता है। भागवत इसे विराट पुरुष की ग्रीवा बताता है और खगोलीय दूरियाँ देता है। दोनों इसकी सात्त्विकता पर एकमत हैं।
'कृतक', 'अकृतक' और 'कृतकाकृतक' लोकों में क्या अंतर है?
कृतक लोक (त्रैलोक्य) विनाशी हैं, अकृतक (जनलोक से सत्यलोक तक) नित्य हैं। महर्लोक कृतकाकृतक है — नैमित्तिक प्रलय में भस्म नहीं होता पर निर्जन हो जाता है।
महर्लोक की 'कृतकाकृतक' प्रकृति का क्या अर्थ है?
कृतकाकृतक = आंशिक रूप से विनाशी (कृतक) + आंशिक रूप से अविनाशी (अकृतक)। नैमित्तिक प्रलय में महर्लोक भस्म नहीं होता पर निर्जन हो जाता है — यही इसकी मिश्र प्रकृति है।
महर्लोक को 'कृतकाकृतक' क्यों कहते हैं?
कृतकाकृतक = आंशिक रूप से विनाशी + आंशिक रूप से अविनाशी। नैमित्तिक प्रलय में महर्लोक भस्म नहीं होता (अकृतक) पर निर्जन हो जाता है (कृतक)।
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