विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत में अश्वत्थामा को दंड देने के बाद पांडवों की शोकपूर्ण स्थिति बताई गई है। द्रौपदी और पांडव अपने पुत्रों और भाई-बंधुओं की मृत्यु से अत्यंत व्याकुल थे। अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़कर लाया, द्रौपदी की करुणा और कृष्ण के धर्मसंकट वाले निर्देश के बाद अश्वत्थामा की मणि काटी गई, उसका तेज छीन लिया गया और उसे शिविर से निकाल दिया गया। इसके बाद पांडवों ने मृत स्वजनों के लिए जो कर्तव्य था, उसे किया। पाठ कहता है कि पुत्र-शोक से व्याकुल पांडवों ने कृष्णा द्रौपदी के साथ अपने मरे हुए भाई-बंधुओं की दाह आदि अंतिम क्रियाएँ संपन्न कीं। इस प्रकार कथा अपराध-दंड के बाद शोक, संस्कार और धर्म-कर्म की ओर लौटती है।
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