विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में पिछले जन्म को जानने की संभावना को स्वीकार किया गया है, किंतु यह साधारण मनुष्य के लिए सहज नहीं है।
पातंजल योगसूत्र (3.18) में कहा गया है — 'संस्कार-साक्षात्करणात् पूर्व जातिज्ञानम्' — अर्थात संस्कारों का साक्षात्कार करने से पूर्व जन्म का ज्ञान होता है। गहरे ध्यान और समाधि में जब योगी संस्कारों की परतों को देख पाता है, तो उसे पिछले जन्मों की झलक मिल सकती है।
भगवद्गीता (4.5) में श्रीकृष्ण कहते हैं — 'बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन...' — मुझे अपने और तुम्हारे कई जन्म याद हैं। श्रीकृष्ण ने यह भी बताया कि जो मनुष्य बहुत अभ्यास से योग सिद्ध करता है, उसे अगले जन्म में अपनी पूर्व साधना का स्मरण होता है।
जातिस्मर — जो व्यक्ति जन्म से ही पिछले जन्म की स्मृतियाँ लेकर जन्मता है, उसे 'जातिस्मर' कहते हैं। पुराणों और आधुनिक शोधों में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं।
साधारण जनों के लिए — कुछ विशेष भय, गहरी रुचियाँ, बिना कारण के लगाव-द्वेष, सपने और जन्मजात प्रतिभाएँ पिछले जन्म के संस्कारों के संकेत हो सकते हैं। किंतु इन्हें निश्चित प्रमाण नहीं माना जा सकता।
याद रखें — शास्त्र यह भी कहते हैं कि पिछले जन्म को जानने की जिज्ञासा से अधिक महत्वपूर्ण है वर्तमान जन्म को सुधारना और मोक्ष की दिशा में बढ़ना।





