लोकविशुद्ध चक्र क्या है?विशुद्ध चक्र कण्ठ क्षेत्र में स्थित पाँचवाँ ऊर्जा केंद्र है जो सत्य, पवित्रता और उच्चतर आध्यात्मिक चेतना का द्वार है। गरुड़ पुराण इसे महर्लोक का सूक्ष्म प्रतिनिधित्व मानता है।#विशुद्ध चक्र#कण्ठ#योग
लोकमहर्लोक में 'तपो यज्ञ' क्या होता है?तपो यज्ञ में साधक देह, इन्द्रियों और मन को तपस्या की अग्नि में शुद्ध करता है। इससे योग-अग्नि से पोषण संभव होता है और सभी देह-विकार नष्ट हो जाते हैं।#तपो यज्ञ#महर्लोक#तपस्या
लोकयोग साधना से महर्लोक कैसे मिलता है?अष्टांग योग, सिद्धियाँ और संन्यास के माध्यम से सिद्ध योगी अपने प्राणों को स्वेच्छा से महर्लोक में ले जा सकते हैं। भागवत (११.२४.१४) यही कहता है।#योग#महर्लोक#अष्टांग योग
लोकशाक द्वीप में किसकी पूजा होती है?शाक द्वीप में ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक निवासी प्राणायाम और अष्टांग योग द्वारा वायु देव (प्राणतत्व) की उपासना करते हैं।#शाक द्वीप#वायु देव#योग
लोकशाक द्वीप में वायु देव की उपासना कैसे होती है?शाक द्वीप में ऋतव्रत आदि चार वर्ण प्राणायाम और अष्टांग योग द्वारा समाधिस्थ होकर भगवान के वायु स्वरूप (प्राणतत्व) की आराधना करते हैं।#शाक द्वीप#वायु देव#योग
शिव पुराण परिचयकैलाश संहिता में क्या वर्णित हैकैलाश संहिता (6,000 श्लोक) में कैलाश धाम की महिमा, शिव का आदियोगी स्वरूप, योग-ध्यान-मोक्ष मार्ग, शिव के पंचमुख स्वरूप और शिव-तत्व का दार्शनिक विवेचन है।#कैलाश संहिता#योग#शिव तत्व
लोकभुवर्लोक की 'प्राण-मनस' अवधारणा का क्या अर्थ है?प्राण-मनस अवधारणा का अर्थ है कि भुवर्लोक प्राण (जीवन ऊर्जा) और मन (चेतना) का संगम क्षेत्र है। योग साधक प्राण-नियंत्रण से यहाँ की सिद्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं।#प्राण मनस#भुवर्लोक#वायु पुराण
लोकवायु पुराण भुवर्लोक को 'प्राण-मनस लोक' क्यों कहता है?वायु पुराण भुवर्लोक को प्राण-मनस लोक इसलिए कहता है क्योंकि यह वायु (प्राण) तत्व से बना है, यहाँ की सत्ताएं प्राणमय हैं और यह स्थूल तथा आध्यात्मिक जगत के बीच की कड़ी है।#वायु पुराण#भुवर्लोक#प्राण मनस
तीर्थ स्थलऋषिकेश में कौन से आश्रम जरूर जाएं?परमार्थ निकेतन(गंगा आरती), शिवानंद आश्रम(योग/वेदांत), वशिष्ठ गुफा(ध्यान), बीटल्स आश्रम, स्वर्ग आश्रम, योग निकेतन। लक्ष्मण झूला, नीलकंठ महादेव भी।#ऋषिकेश#आश्रम#योग
ध्यान साधनाध्यान और योग में क्या अंतर है?शास्त्रीय: योग=सम्पूर्ण 8 अंग, ध्यान=7वाँ अंग। योगसूत्र: ध्यान=एक विषय पर निरंतर प्रवाह। आधुनिक: योग=आसन/शारीरिक, ध्यान=मानसिक। सम्बंध: आसन→प्राणायाम→प्रत्याहार→धारणा→ध्यान→समाधि। ध्यान=योग का हृदय। दोनों परस्पर पूरक।#ध्यान#योग#अष्टांग योग
अघोर फलअघोर शिव का ध्यान करने से क्या फल मिलता है?योग के द्वारा महादेव का ध्यान करने वाले मनीषी अविनाशी भगवान् रुद्र के दिव्य लोक को प्राप्त होते हैं।#अघोर ध्यान#महादेव#योग
वाराणसी और पार्वती प्रश्नवाराणसी में पार्वती ने शिव से क्या पूछा?पार्वती ने पूछा कि तप, विद्या, योग आदि किस साधन से शिव वश में होते, पूजित होते और दर्शन देते हैं।#वाराणसी#पार्वती#शिव
योग और वैराग्ययुक्त योगी कौन होता है?सभी आसक्तियों से निवृत्त प्राणी युक्त-योगी कहलाता है।#युक्त योगी#आसक्ति निवृत्ति#योग
प्राणायामप्राणायाम का सही अर्थ क्या है?प्राण और अपान वायु का निरोध प्राणायाम कहलाता है।#प्राणायाम#प्राण#अपान
प्रत्याहार और ध्यानध्यान और समाधि में क्या अंतर है?ध्येय विषय में चित्त की एकाग्रता ध्यान है; ध्येयमात्र से प्रकाशित देहशून्य स्थिति समाधि है।#ध्यान#समाधि#चित्त एकाग्रता
प्रत्याहार और ध्यानइन्द्रियों को विषयों से कैसे हटाया जाता है?विषयों में आसक्त इन्द्रियों को शीघ्र उनसे हटाकर इन्द्रियों पर नियंत्रण करना प्रत्याहार है।#प्रत्याहार#इन्द्रियनिग्रह#विषय
योग का स्वरूपशिव की कृपा से योग और मुक्ति कैसे मिलती है?चित्त की एकाग्रता, रुद्र का ज्ञान और निर्वाण शिव की कृपा से बताए गए हैं।#शिव कृपा#योग#मुक्ति
योग का स्वरूपयोग का सही अर्थ क्या बताया गया है?जीव को परमार्थ तत्त्व का ज्ञान प्राप्त होना योग कहा गया है; चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण भी योग बताया गया है।#योग#परमार्थ तत्त्व#चित्त एकाग्रता
पाशुपत योगपाशुपत योग क्या है?पाशुपत योग वह योग है जिसे पशुपति रुद्र ने सबको परम ऐश्वर्य दिलाने के लिए प्रवर्तित किया।#पाशुपत योग#पशुपति रुद्र#परम ऐश्वर्य
शिष्य परम्पराशैवी दीक्षा क्या बताई गई है?शैवी दीक्षा का अलग विधि-वर्णन यहाँ नहीं है; योगाचार्यों के शिष्य शैवी दीक्षा से सम्पन्न बताए गए हैं।#शैवी दीक्षा#शिष्य#भस्म
शिष्य परम्परायोगाचार्यों के शिष्यों के गुण क्या थे?योगाचार्यों के शिष्य धर्मात्मा, महान् ओजस्वी, विमल आत्मा, सिद्ध, ब्रह्मनिष्ठ, ज्ञान-योग में निरत, भस्म-विभूषित और शैवी दीक्षा से सम्पन्न थे।#योगाचार्य शिष्य#धर्मात्मा#ब्रह्मनिष्ठ
शिष्य परम्पराशिव की कृपा से योग में कौन प्रवृत्त हुए?व्यासावतार, योगाचार्यावतार, शिवावतार, चार शिष्य और अनेक प्रशिष्य महेश्वर की कृपा से योग में प्रवृत्त हुए।#शिव कृपा#योग#व्यासावतार
माहेश्वर योगज्ञान से योग और योग से मुक्ति कैसे मिलती है?शंकर की अनुकम्पा से ज्ञान, ज्ञान से योग में प्रवृत्ति और योग से मुक्ति प्राप्त होती है।#ज्ञान#योग#मुक्ति
माहेश्वर योगशिव की कृपा से ज्ञान कैसे मिलता है?शिव की अनुकम्पा से ज्ञान उत्पन्न होता है; उसी ज्ञान से योग में प्रवृत्ति होती है।#शिव कृपा#ज्ञान#योग
माहेश्वर योगमाहेश्वर योग क्या है?माहेश्वर योग शिवकृपा से प्राप्त होने वाला ज्ञानस्वरूप दिव्य योग है, जिसमें ज्ञान से योग और योग से मुक्ति बताई गई है।#माहेश्वर योग#शिव कृपा#ज्ञान
श्रीमद्भागवतयोग तपस्या और धर्म किसके लिए हैं?योग, तपस्या और धर्म का लक्ष्य श्रीकृष्ण ही बताए गए हैं; सभी कर्मों और गतियों की समाप्ति भी उन्हीं में है।#योग#तपस्या#धर्म
श्रीमद्भागवतभागवत सप्ताह तप से बड़ा क्यों है?कहा गया है कि जो फल तप, योग और समाधि से भी नहीं मिलता, वह भागवत सप्ताह से सहज मिल जाता है।#भागवत सप्ताह#तप#योग
श्रीमद्भागवतक्या हरि कीर्तन से तप और योग का फल मिलता है?हाँ, कहा गया है कि कलियुग में केशव-कीर्तन से वह फल मिलता है जो तप, योग और समाधि से भी दुर्लभ है।#हरि कीर्तन#तप#योग
लोकहंस और सोहम का संबंधहंस मंत्र श्वास का नाद है और सोहम उसका अद्वैत अर्थ है: वह मैं हूँ।#हंस#सोहम#अजपा जाप
लोकहंस मंत्र क्या हैहंस मंत्र श्वास और आत्मबोध से जुड़ा सोहम भाव का योगिक मंत्र है।#हंस मंत्र#सोहम#श्वास
लोकसत्यलोक कैसे जाते हैं?सत्यलोक जाने के लिए कठोर तपस्या, निष्काम भक्ति और अखंड ब्रह्मचर्य आवश्यक है। मृत्यु के बाद देवयान मार्ग से आत्मा सत्यलोक पहुँचती है।#सत्यलोक#यात्रा#देवयान
लोकऊर्ध्वरेता कौन होते हैं?ऊर्ध्वरेता वे महान ब्रह्मचारी हैं जिन्होंने जीवन भर वीर्य का संरक्षण कर उसे आध्यात्मिक तेज में बदल लिया। इनकी यही योग्यता उन्हें सत्यलोक का निवासी बनाती है।#ऊर्ध्वरेता#ब्रह्मचर्य#तपस्या
भक्ति एवं आध्यात्मपिछले जन्म को जानने का कोई तरीका है?योग के गहरे अभ्यास और समाधि से पूर्वजन्म की झलक मिल सकती है। जन्मजात जातिस्मर व्यक्तियों को यह स्मृति स्वाभाविक होती है। पातंजल योगसूत्र में इसका शास्त्रीय आधार है।#पूर्वजन्म#जातिस्मर#योग
योग एवं साधनासूर्य नमस्कार में कितनी मुद्राएं होती हैं?सूर्य नमस्कार में 12 मुद्राएँ होती हैं — प्रणामासन से आरंभ होकर पर्वतासन, अष्टांग नमस्कार, भुजंगासन आदि से होते हुए पुनः प्रणामासन पर समाप्त होती हैं। प्रत्येक मुद्रा के साथ एक सूर्य नाम मंत्र का उच्चारण होता है।#सूर्य नमस्कार#योग#12 आसन
ज्योतिषत्रिपुष्कर योग में शुभ कामतिथि+वार+नक्षत्र विशेष संयोग = कार्य 3 गुना फल। संपत्ति/निवेश/व्यापार/दान शुभ। ऋण/झगड़ा वर्जित (3 गुना अशुभ भी)। पंचांग में देखें।#त्रिपुष्कर#योग#शुभ
ज्योतिषद्विपुष्कर योग में शुभ कामतिथि+वार+नक्षत्र = कार्य 2 गुना फल। त्रिपुष्कर जैसा, बुध/गुरु/शुक्रवार। संपत्ति/निवेश/दान शुभ। अशुभ = 2 गुना अशुभ।#द्विपुष्कर#योग#शुभ
मुहूर्तसर्वार्थ सिद्धि योग कब होता है महत्ववार+नक्षत्र विशिष्ट संयोग। 'सभी कार्य सफल' — व्यापार, संपत्ति, विवाह, यात्रा, निवेश। अमृत सिद्धि से व्यापक। पंचांग/ऐप में 'सर्वार्थ सिद्धि' देखें।#सर्वार्थ सिद्धि#योग#शुभ
मुहूर्तगुरु पुष्य योग में क्या खरीदना शुभगुरुवार+पुष्य = सोना, पीली वस्तुएं, शिक्षा सामग्री, पुखराज, धार्मिक सामग्री, संपत्ति। शिक्षा/धर्म = गुरु पुष्य > रवि पुष्य। बृहस्पति=ज्ञान/धन/धर्म।#गुरु पुष्य#योग#खरीदारी
मुहूर्तअमृत सिद्धि योग कब होता है इसमें क्या करेंवार+नक्षत्र संयोग (रवि+हस्त, सोम+मृगशिरा, गुरु+पुष्य आदि)। नया व्यापार, खरीदारी, गृह प्रवेश, पूजा — कोई भी शुभ कार्य। 'अमृत जैसा फल।' पंचांग/ऐप में देखें।#अमृत सिद्धि#योग#शुभ
हिंदू दर्शनगीता के 18 अध्यायों का सारांश क्या हैगीता 18 अध्याय = 3 खंड: कर्म (1-6), भक्ति (7-12), ज्ञान (13-18)। मुख्य: अर्जुन का शोक → आत्मा अमर → कर्म करो फल छोड़ो → अवतार → ध्यान → भक्ति → विश्वरूप → गुण-विभाग → अंतिम उपदेश 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' (18.66)।#गीता#18 अध्याय#सारांश
आत्मा और मोक्षमोक्ष प्राप्ति के चार मार्ग कौन से हैंचार मार्ग: ज्ञान योग (आत्म-ज्ञान — शंकराचार्य), भक्ति योग (ईश्वर समर्पण — गीता 12.6), कर्म योग (निष्काम कर्म — गीता 2.47), राज योग (ध्यान-समाधि — पतंजलि)। ये परस्पर पूरक हैं। गीता 18.66 — भगवान की शरण = सर्वपाप मुक्ति।#मोक्ष#चार मार्ग#योग
मुहूर्त एवं योगअमृत सिद्धि योग में पूजा का क्या विधान हैअमृत सिद्धि योग: विशिष्ट वार + नक्षत्र (जैसे गुरुवार+पुष्य, शनिवार+रोहिणी)। कर्म = अमृत (शाश्वत) फल। मंत्र सिद्धि, औषधि आरम्भ, दीक्षा, गृह प्रवेश सर्वोत्तम। दान = अक्षय। सर्वार्थ सिद्धि से भिन्न — वह 'सिद्धि', यह 'अमृत (शाश्वत) फल'।#अमृत सिद्धि#योग#शुभ मुहूर्त
मुहूर्त एवं योगसर्वार्थ सिद्धि योग में पूजा करने से क्या लाभ मिलता हैसर्वार्थ सिद्धि योग: विशिष्ट वार + नक्षत्र संयोग = सभी कार्य सिद्ध। पूजा = कई गुना फल, मंत्र सिद्धि, मनोकामना पूर्ति। गृह प्रवेश, विवाह, व्यापार, खरीद — सभी शुभ। अन्य दोषों को भी क्षीण करता है। पंचांग में तिथि देखें।#सर्वार्थ सिद्धि#योग#शुभ मुहूर्त
मंत्र एवं योगसूर्य नमस्कार मंत्र कौन से हैं और कैसे बोलेंसूर्य नमस्कार में 12 मंत्र: ॐ मित्राय नमः, ॐ रवये नमः, ॐ सूर्याय नमः, ॐ भानवे नमः, ॐ खगाय नमः, ॐ पूष्णे नमः, ॐ हिरण्यगर्भाय नमः, ॐ मरीचये नमः, ॐ आदित्याय नमः, ॐ सवित्रे नमः, ॐ अर्काय नमः, ॐ भास्कराय नमः। प्रत्येक मंत्र एक आसन के साथ। फल: आयु, प्रज्ञा, बल, तेज वृद्धि।#सूर्य नमस्कार#12 मंत्र#योग
ध्यान साधनाध्यान और योग में क्या अंतर है?शास्त्रीय: योग=सम्पूर्ण 8 अंग, ध्यान=7वाँ अंग। योगसूत्र: ध्यान=एक विषय पर निरंतर प्रवाह। आधुनिक: योग=आसन/शारीरिक, ध्यान=मानसिक। सम्बंध: आसन→प्राणायाम→प्रत्याहार→धारणा→ध्यान→समाधि। ध्यान=योग का हृदय। दोनों परस्पर पूरक।#ध्यान#योग#अष्टांग योग
ध्यानध्यान और योग में क्या अंतर है?योग = संपूर्ण अष्टांग पद्धति (यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधि)। ध्यान = योग का 7वाँ अंग। ध्यान = एक विषय पर अखंड एकाग्रता। योग = चित्त वृत्ति निरोध (पतञ्जलि)। ध्यान, योग का सबसे महत्त्वपूर्ण अभ्यास है।#ध्यान#योग#अष्टांग योग