विस्तृत उत्तर
वायु पुराण और वेदांत दर्शन में भुवर्लोक को 'प्राण-मनस' (Prana-Manas) लोक अर्थात सूक्ष्म जीवन-ऊर्जा का लोक कहा गया है। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला, यह लोक मुख्य रूप से वायु-तत्व से निर्मित है और वायु को ही प्राण माना जाता है। दूसरा, यहाँ की सत्ताओं का शरीर अन्नमय न होकर प्राण-मय और मनो-मय होता है। तीसरा, वायु पुराण इस लोक को भौतिक शरीर और विशुद्ध आध्यात्मिक बुद्धि के बीच की कड़ी मानता है। इसीलिए अष्टांग योग या हठ योग के साधक जब अपने प्राण (वायु) को वश में करते हैं तो वे भौतिक देह की सीमाओं को लांघकर मानसिक रूप से भुवर्लोक की सिद्धियों तक पहुँचने में सक्षम हो जाते हैं।
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