विस्तृत उत्तर
नारदजी अपने पूर्वजीवन का अनुभव बताते हैं। वे वेदवादी ब्राह्मणों की दासी के पुत्र थे और वर्षा ऋतु में एक स्थान पर ठहरे योगियों की सेवा में लगे थे। वे बालक थे, पर चंचल नहीं थे, इंद्रिय-संयमी थे, खेलकूद से दूर थे और आज्ञा के अनुसार सेवा करते थे। संतों ने उनके विनम्र स्वभाव को देखकर कृपा की। उनकी अनुमति लेकर वे पात्रों में लगा प्रसाद एक बार खा लेते थे। नारदजी कहते हैं कि इससे उनके सारे पाप धुल गए। फिर सेवा करते-करते चित्त शुद्ध हुआ और जिन महात्माओं का भजन-पूजन वे देखते थे, उसी में उनकी रुचि हो गई। इसलिए प्रसाद यहाँ साधु-संग, अनुमति, सेवा और विनम्रता से जुड़ी शुद्धि का कारण बताया गया है।
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