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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 23-25⏱ 1 मिनट पठन

प्रसाद खाने से पाप मिटते हैं?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

नारदजी बताते हैं कि संतों की अनुमति से पात्रों में लगा प्रसाद एक बार खाने से उनके पाप धुल गए।

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विस्तृत उत्तर

नारदजी अपने पूर्वजीवन का अनुभव बताते हैं। वे वेदवादी ब्राह्मणों की दासी के पुत्र थे और वर्षा ऋतु में एक स्थान पर ठहरे योगियों की सेवा में लगे थे। वे बालक थे, पर चंचल नहीं थे, इंद्रिय-संयमी थे, खेलकूद से दूर थे और आज्ञा के अनुसार सेवा करते थे। संतों ने उनके विनम्र स्वभाव को देखकर कृपा की। उनकी अनुमति लेकर वे पात्रों में लगा प्रसाद एक बार खा लेते थे। नारदजी कहते हैं कि इससे उनके सारे पाप धुल गए। फिर सेवा करते-करते चित्त शुद्ध हुआ और जिन महात्माओं का भजन-पूजन वे देखते थे, उसी में उनकी रुचि हो गई। इसलिए प्रसाद यहाँ साधु-संग, अनुमति, सेवा और विनम्रता से जुड़ी शुद्धि का कारण बताया गया है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 23-25
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

प्रसाद खाने से पाप मिटते हैं को संदर्भ सहित समझें

प्रसाद खाने से पाप मिटते हैं का सबसे सीधा सार यह है: नारदजी बताते हैं कि संतों की अनुमति से पात्रों में लगा प्रसाद एक बार खाने से उनके पाप धुल गए।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 23-25 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 23-25 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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श्रीमद्भागवत श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

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