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विस्तृत उत्तर
पुराणों के अनुसार रावण लंका का शक्तिशाली राक्षस राजा था, लेकिन जय-विजय कथा में उसका एक गहरा पूर्वजन्म भी बताया गया है। वह वैकुण्ठ द्वारपाल जय का दूसरा शत्रु जन्म माना जाता है। श्राप के कारण जय को भगवान विष्णु से दूर होकर असुर रूप लेना पड़ा, और त्रेता युग में वही रावण बना। रावण में शक्ति, विद्या और तपस्या थी, लेकिन काम और अहंकार उसके पतन का कारण बने। अंततः श्रीराम के हाथों वध होकर उसने श्राप के दूसरे चरण से मुक्ति पाई।
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