विस्तृत उत्तर
पुराणों की कथा के अनुसार रावण अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु के वैकुण्ठ द्वारपाल जय का अवतार माना जाता है। जय और विजय को सनकादिक मुनियों के श्राप से वैकुण्ठ छोड़कर भौतिक जगत में जन्म लेना पड़ा था। भगवान विष्णु ने उन्हें दो विकल्प दिए थे: सात जन्म भक्त रूप में या तीन जन्म शत्रु रूप में। भगवान से शीघ्र वापस मिलने की इच्छा से उन्होंने तीन शत्रु जन्म चुने, जिनमें त्रेता युग में जय रावण के रूप में जन्मा। इसलिए रावण केवल एक राक्षस राजा नहीं, बल्कि भगवान की लीला में उतरा हुआ श्रापित पार्षद माना गया है।
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