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विस्तृत उत्तर
रावण पहले जन्म में वैकुण्ठ के द्वारपाल जय के रूप में वर्णित है। जय और विजय भगवान विष्णु के अत्यंत निकट सेवक थे, लेकिन सनकादिक मुनियों को रोकने के कारण उन्हें श्राप मिला। उस श्राप के बाद उन्हें भौतिक जगत में असुर रूप में जन्म लेना पड़ा। उनके तीन जन्मों में पहला जन्म सत्ययुग में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में, दूसरा जन्म त्रेता में रावण और कुम्भकर्ण के रूप में, और तीसरा जन्म द्वापर में शिशुपाल और दन्तवक्र के रूप में हुआ। इस दृष्टि से रावण जय का दूसरा असुर जन्म था।
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