📖
विस्तृत उत्तर
हाँ, पुराणों की जय-विजय कथा के अनुसार रावण मूल रूप से भगवान विष्णु के द्वारपाल जय का जन्म था। वैकुण्ठ में जय और विजय भगवान के द्वार पर सेवा करते थे, लेकिन सनकादिक मुनियों को रोकने के कारण उन्हें श्राप मिला। भगवान विष्णु ने स्वयं इस पतन को अपनी लीला का भाग माना और उन्हें तीन जन्मों में शत्रु रूप लेने का अवसर दिया। त्रेता युग में जय रावण बना और विजय कुम्भकर्ण बना। इसलिए रावण को एक श्रापित वैकुण्ठ पार्षद के रूप में भी समझा जाता है, केवल साधारण असुर के रूप में नहीं।
🔗
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक
इसे अपने प्रियजनों के साथ साझा करें
क्या यह उत्तर सहायक था?


