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विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन में देवताओं को असुरों की तुलना में कम कष्ट इसलिए हुआ क्योंकि वे वासुकी नाग की पूंछ की ओर थे। वासुकी के मुख से विषैली फुफकार, धुआं और गर्म श्वास निकल रही थी, जिसका प्रभाव मुख की ओर खड़े असुरों पर पड़ा। देवताओं ने भगवान विष्णु के संकेत पर विनम्रता से पूंछ की ओर स्थान स्वीकार किया। वे बाहरी प्रतिष्ठा के विवाद में नहीं पड़े। इसके साथ ही भगवान विष्णु देवताओं के भीतर सत्त्वगुण और शक्ति के रूप में भी स्थित थे। इसलिए वे मंथन के कठिन श्रम में भी टिक सके।
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