विस्तृत उत्तर
संवर्तक अग्नि पाताल से उठकर स्वर्ग तक सब कुछ भस्म करती है। यह महाप्रलय के संहार चरण में अव्यक्त अस्त्र का अग्नि-रूप है।
संवर्तक अग्नि कहाँ से उठती है को संदर्भ सहित समझें
संवर्तक अग्नि कहाँ से उठती है का सबसे सीधा सार यह है: यह पाताल से उठकर स्वर्ग तक फैलती है।
लोक जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
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इसी विषय के 5 प्रश्न
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मार्कण्डेय मुनि की तपस्या और महर्लोक के बीच क्या संबंध है?
मार्कण्डेय मुनि की अखंड तपस्या उन्हें महर्लोक का अधिकारी बनाती है। नैमित्तिक प्रलय के एकार्णव में उन्होंने अपने योगबल से विचरण करते हुए भगवान विष्णु के बालक स्वरूप के दर्शन किए।
संकर्षण की अग्नि का उद्गम कहाँ से होता है?
संकर्षण की अग्नि (कालानल) का उद्गम पाताल के मूल में स्थित भगवान शेषनाग (संकर्षण/अनन्त देव) के मुख से होता है। यह पाताल से ऊपर उठकर त्रैलोक्य को भस्म करती है।
मार्कण्डेय पुराण में महर्लोक का वर्णन कैसे है?
मार्कण्डेय पुराण में वर्णन है — नैमित्तिक प्रलय में त्रैलोक्य के निवासी महर्लोक की ओर भागते हैं पर महर्लोक के ऋषि स्वयं जनलोक जाते हैं। एकार्णव से महर्लोक अपनी ऊँचाई से बचता है।
ब्रह्माण्ड पुराण में महर्लोक के मन्वन्तर संबंध का वर्णन कैसे है?
ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार प्रत्येक मन्वन्तर के बाद सेवानिवृत्त इन्द्र, मनु और सप्तर्षि महर्लोक में आते हैं। उनका तेज ब्रह्मा के समान होता है और वे पाँच आध्यात्मिक ऐश्वर्यों से युक्त होते हैं।
गीता के 'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः' का महर्लोक पर क्या अर्थ है?
गीता (८.१६) का 'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन' महर्लोक पर भी लागू है — यह भी पुनरावर्ती है। यहाँ से मोक्ष न मिला तो नई सृष्टि में वापसी होती है।
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