विस्तृत उत्तर
शिव मंदिरों पर कीर्तिमुख इसलिए बना होता है क्योंकि भगवान शिव ने उसे अपने द्वार का रक्षक और प्रिय गण बनाया। कथा के अनुसार कीर्तिमुख ने शिव की आज्ञा पर अपना ही शरीर खा लिया और केवल मुख शेष रहा। उसकी आज्ञाकारिता और आत्मबलिदान से प्रसन्न होकर शिव ने उसे वरदान दिया कि वह मंदिरों के द्वार पर प्रतिष्ठित होगा। बिना कीर्तिमुख की स्मृति या सम्मान के शिवपूजा अधूरी मानी गई। इसका प्रतीकात्मक अर्थ है कि भक्त को शिव तक पहुँचने से पहले अपने अहंकार, लोभ और दुष्ट दृष्टि को द्वार पर ही छोड़ना चाहिए। कीर्तिमुख दुष्टता को निगलने वाली शक्ति है।
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