विस्तृत उत्तर
कामदहन के बाद देवताओं को चिन्ता हुई कि अब शिव-पार्वती विवाह कैसे होगा। तब देवताओं ने ब्रह्माजी से विनती की कि वे शिवजी को विवाह के लिये मनायें।
ब्रह्माजी ने शिवजी से प्रार्थना की और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के वचनों को याद दिलाया। शिवजी ने प्रसन्नतापूर्वक कहा — 'ऐसेइ होउ' (ऐसा ही हो)।
चौपाई — 'सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी। तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साईं॥'
इसका अर्थ — ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वचनोंको याद करके शिवजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा — 'ऐसा ही हो।' तब देवताओंने नगाड़े बजाये और फूलोंकी वर्षा करके 'जय हो! देवताओंके स्वामीकी जय हो!' ऐसा कहने लगे।
इसके बाद सप्तर्षियों को पार्वतीजी के पास भेजा गया (जिन्होंने उनकी परीक्षा ली) और फिर विवाह की तैयारी शुरू हुई।





