विस्तृत उत्तर
नारदजी कहते हैं कि जिस वाणी में भगवान के जगत्-पवित्र यश का गान नहीं होता, वह सुन्दर होकर भी श्रेष्ठ साधकों को प्रिय नहीं होती। इसके विपरीत जिस रचना में भगवान के नाम और यश अंकित हों, भले वह साहित्यिक दृष्टि से पूर्ण न हो, वह जनों के पापों का नाश करती है। साधुजन ऐसी वाणी का श्रवण, गान और कीर्तन करते हैं। आगे नारदजी बताते हैं कि भगवदर्थ कर्म करने वाले लोग बार-बार भगवान श्रीकृष्ण के गुण और नामों का कीर्तन तथा स्मरण करते हैं। वे वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षण को नमस्कार करने वाला मंत्र भी कहते हैं। इसलिए भगवान का नाम लेना केवल बोलना नहीं, बल्कि पाप-शुद्धि, स्मरण, भक्ति और यथार्थ दर्शन से जुड़ा साधन है।
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