विस्तृत उत्तर
भागवत कथा में फालतू बात इसलिए नहीं करनी चाहिए क्योंकि श्रवण का फल शुद्ध चित्त और एकाग्रता से जुड़ा है। पाठ कहता है कि लोक, संपत्ति, धन, घर और पुत्र की चिंता छोड़कर शुद्ध चित्त से कथा में ध्यान रखने वाला उत्तम फल पाता है। दोपहर के विराम में भी वैष्णवों को कथा के प्रसंग के अनुसार भगवान के गुणों का कीर्तन करना चाहिए, व्यर्थ बात नहीं करनी चाहिए। इसका भाव है कि सप्ताह के सात दिन मन को कथा से हटाकर संसार की बातों में न लगाया जाए। फालतू बात ध्यान तोड़ती है, कथा का रस घटाती है और श्रवण को केवल बाहरी उपस्थिति बना देती है। इसलिए वाणी को कीर्तन और कथा-स्मरण में लगाना बताया गया है।
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