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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 6, श्लोक 80, 83⏱ 1 मिनट पठन

भागवत रस बार-बार क्यों पीना चाहिए?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

शुकदेवजी कहते हैं कि भागवत रस अमृतमय, छिलका-गुठली रहित और दुर्लभ है; चेतना रहते इसे बार-बार पीना चाहिए।

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विस्तृत उत्तर

भागवत रस बार-बार पीने को इसलिए कहा गया है कि यह वेदरूपी कल्पवृक्ष का पका फल है और शुकदेव के मुख से अमृतरस से संयुक्त हुआ है। शुकदेवजी इसे रस का भंडार बताते हैं, जिसमें न छिलका है न गुठली, अर्थात त्याज्य कुछ नहीं। यह इसी लोक में उपलब्ध है, इसलिए जब तक शरीर में चेतना रहे, तब तक इसका बार-बार पान करना चाहिए। आगे वे कहते हैं कि यह रस स्वर्ग, सत्यलोक, कैलास और वैकुंठ में भी नहीं है। इसलिए भाग्यवान श्रोताओं को इसे खूब पीना चाहिए और कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यह बार-बार पान भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और मुक्ति से जुड़ा हुआ है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 6, श्लोक 80, 83
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

भागवत रस बार-बार क्यों पीना चाहिए को संदर्भ सहित समझें

भागवत रस बार-बार क्यों पीना चाहिए का सबसे सीधा सार यह है: शुकदेवजी कहते हैं कि भागवत रस अमृतमय, छिलका-गुठली रहित और दुर्लभ है; चेतना रहते इसे बार-बार पीना चाहिए।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 6, श्लोक 80, 83 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 6, श्लोक 80, 83 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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श्रीमद्भागवत श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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