विस्तृत उत्तर
नारदजी व्यासजी से कहते हैं कि जो मनुष्य अपना स्वधर्म छोड़कर भगवान के चरणकमलों का भजन करता है, उसके लिए भय की बात नहीं है। यदि भजन परिपक्व होने से पहले छूट भी जाए, तब भी उसका अमंगल नहीं होता। वे उल्टा प्रश्न करते हैं कि जो भगवान का भजन नहीं करते और केवल स्वधर्म का पालन करते हैं, उन्हें कौन-सा बड़ा लाभ मिल जाता है। आगे वे भक्त की स्थिति बताते हैं: भगवान श्रीकृष्ण के चरणारविंद का सेवक यदि कभी दैवयोग से बुरा भाव भी पा ले, तो कर्मी मनुष्य की तरह जन्म-मृत्यु के संसार में नहीं लौटता। वह भगवान के चरणकमलों के आलिंगन का स्मरण करके उन्हें छोड़ना नहीं चाहता, क्योंकि उसे उस रस का स्वाद मिल चुका होता है।
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