विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में महर्षि पराशर स्पष्ट रूप से बताते हैं कि जम्बूद्वीप के अन्य आठ वर्ष केवल भोगभूमियाँ हैं जहाँ पूर्वजन्म के पुण्यों का भोग किया जाता है किन्तु केवल भारतवर्ष ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की एकमात्र कर्मभूमि है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अन्य वर्षों के निवासियों को बिना कर्म किए ही छह प्रकार की सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। केवल इसी भारत भूमि पर सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग — ये चारों युग अपना काल-चक्र पूरा करते हैं जबकि अन्य किसी भी वर्ष में युग-व्यवस्था लागू नहीं होती — वहाँ सदैव त्रेता युग के समान एक-सा सुखद वातावरण रहता है। अन्य बाहरी द्वीपों में देव-समान और रोगमुक्त जीवन होने के बावजूद वहाँ के निवासियों को अपने पुण्य क्षीण होने पर पुनः कर्मानुसार भारतवर्ष में जन्म लेना पड़ता है।
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