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दधीचि ने हड्डियाँ दान क्यों की थीं?

वृत्रासुर को केवल दधीचि की अस्थियों से बने वज्र से ही मारा जा सकता था। ब्रह्मा की सलाह पर इंद्र ने दधीचि से निवेदन किया।

संक्षिप्त उत्तर

वृत्रासुर को केवल दधीचि की अस्थियों से बने वज्र से ही मारा जा सकता था। ब्रह्मा की सलाह पर इंद्र ने दधीचि से निवेदन किया। महर्षि ने देव-कल्याण के लिए सहर्ष देह-त्याग किया — यह भारत का सर्वोच्च दान-प्रसंग है।

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विस्तृत उत्तर

दधीचि का अस्थि-दान भारतीय पुराणों में सर्वोच्च त्याग और परोपकार का प्रतीक है।

कारण — सतयुग में वृत्रासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य ने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया और देवताओं को देवलोक से बाहर निकाल दिया। वृत्रासुर को किसी भी अस्त्र-शस्त्र से नहीं मारा जा सकता था। सभी देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए परंतु कोई समाधान नहीं निकला।

ब्रह्मा का उपाय — ब्रह्माजी ने बताया कि पृथ्वी पर महर्षि दधीचि रहते हैं जिनकी अस्थियाँ कठोर तपस्या से अत्यंत शक्तिशाली हो गई हैं। उनकी अस्थियों से बने वज्र से ही वृत्रासुर का वध संभव है।

दधीचि का महादान — देवराज इंद्र महर्षि दधीचि के आश्रम पहुँचे और अपनी व्यथा सुनाई। महर्षि दधीचि ने बिना हिचकिचाए कहा — 'यदि मेरे शरीर से मानव और देव-जाति का कुछ हित होता है तो मैं सहर्ष अपनी अस्थियों का दान करने के लिए तैयार हूँ।' यह कहकर उन्होंने समाधि लगाई और देह त्याग दी।

संदेश — दधीचि का यह त्याग यह सिखाता है कि शरीर नश्वर है किंतु त्याग और परोपकार से प्राप्त पुण्य अमर है।

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