विस्तृत उत्तर
धुंधुकारी का दुराचार केवल बाहर तक सीमित नहीं था; उसने अपने माता-पिता को भी दुख दिया। वेश्याओं के कुसंग में पड़कर उसने अपने पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी। एक दिन उसने माता-पिता को मार-पीटकर घर के बर्तन-भाँड़े भी उठा लिए। इस घटना के बाद आत्मदेव का दुख फूट पड़ा। सारी संपत्ति नष्ट हो जाने पर वे रोते हैं और कहते हैं कि इससे तो इसकी माँ का बाँझ रहना ही अच्छा था, क्योंकि कुपुत्र बहुत दुखदायी होता है। वे सोचते हैं कि अब कहाँ रहें, कहाँ जाएँ और उनका संकट कौन दूर करेगा। धुंधुकारी की यह क्रूरता आगे आत्मदेव के वैराग्य की भूमिका बनती है।
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