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विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के अनुसार किसी शस्त्र द्वारा हत्या अकाल मृत्यु के अंतर्गत आती है। ऐसी मृत्यु प्राकृतिक रूप से आयु पूर्ण होने पर नहीं होती, इसलिए जीवात्मा की संसार से विरक्ति नहीं हुई होती और उसकी आयु शेष रहती है। इस कारण वह अपनी शेष आयु पूर्ण होने तक प्रेत रूप में भटक सकती है। हिंसक और अप्राकृतिक मृत्यु में यदि शास्त्रोक्त संस्कारों का अभाव हो, तो जीवात्मा वायव्य शरीर में आबद्ध होकर भूख-प्यास, असंतोष और अतृप्ति का अनुभव करती है।
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