विस्तृत उत्तर
कथा में एकाग्रता का महत्व धुंधुकारी और अन्य श्रोताओं के फलभेद से समझाया गया है। सबने कथा सुनी, पर धुंधुकारी ने स्थिर चित्त से सुने हुए विषय का मनन किया। इसलिए उसे तत्काल मुक्ति और विमान मिला। विष्णुपार्षद कहते हैं कि दृढ़ न हुआ ज्ञान व्यर्थ है, प्रमाद से श्रवण नष्ट होता है, संदेह से मंत्र निष्फल होता है और चंचल चित्त से जप का फल नष्ट होता है। इसके बाद वे बताते हैं कि कथा में निश्चल मन श्रवण के यथार्थ फल के लिये आवश्यक है। यदि मन इधर-उधर भटकता रहे, तो कथा कानों से सुनाई दे सकती है, पर उसका फल भीतर नहीं उतरता। इसलिए एकाग्रता कथा श्रवण का मूल साधन है।
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