विस्तृत उत्तर
कथा पूरी होने पर श्रोता को अत्यंत भक्ति से भागवत पुस्तक और वक्ता की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद वक्ता श्रोताओं को प्रसाद, तुलसी और प्रसादमालाएँ दे। सभी लोग मृदंग और झाँझ की मनोहर ध्वनि के साथ सुंदर कीर्तन करें। जय-जयकार, नमस्कार और शंखध्वनि का घोष कराया जाए। ब्राह्मणों और याचकों को धन और अन्न दिया जाए। यह समापन केवल कार्यक्रम समाप्ति नहीं, बल्कि कृतज्ञता और पवित्र उत्सव है। इसमें पुस्तक, वक्ता, वैष्णव, कीर्तन, प्रसाद और दान सब जुड़े हैं। इसके बाद श्रोता के प्रकार के अनुसार आगे गीता पाठ, हवन या अन्य शांति-विधि बताई गई है।
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