विस्तृत उत्तर
शौनकादि ऋषियों की प्रशंसा करते हुए सूतजी कहते हैं कि वे धन्य हैं, क्योंकि वे इस जीवन में और विघ्न-बाधा से भरे संसार में समस्त लोकों के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण से सर्वात्मभाव और अनिर्वचनीय अनन्य प्रेम करते हैं। इस प्रेम का फल यह बताया गया कि फिर जन्म-मरण रूप संसार के भयंकर चक्र में नहीं पड़ना होता। यहाँ प्रेम केवल सामान्य श्रद्धा नहीं है; उसे सर्वात्मक आत्मभाव कहा गया है, यानी भगवान को अपने जीवन का परम आश्रय और आत्मीय सत्य मानना। वासुदेव श्रीकृष्ण से ऐसा अनन्य प्रेम संसार-चक्र से मुक्ति का कारण है।
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