विस्तृत उत्तर
कुपुत्र का दुख धुंधुकारी के चरित्र से दिखाया गया है। आत्मदेव ने पुत्र की बड़ी इच्छा की थी, पर धुंधुकारी दुष्ट निकला। उसने चोरी, हिंसा, कुसंग और दुराचार अपनाया। वेश्याओं के कुसंग में उसने पिता की संपत्ति नष्ट कर दी और माता-पिता को मार-पीटकर घर के बर्तन उठा लिए। तब आत्मदेव रोकर कहते हैं कि इससे तो उसकी माँ का बाँझ रहना अच्छा था, क्योंकि कुपुत्र बहुत दुखदायी होता है। वे संकट में पड़कर सोचते हैं कि अब कहाँ जाएँ। यही अनुभव गोकर्ण के वैराग्य उपदेश का कारण बनता है। कथा का संकेत है कि पुत्र-मोह यदि विवेकहीन हो, तो वही गहरा दुख बन सकता है।
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