विस्तृत उत्तर
शास्त्रों के अनुसार, महामृत्युंजय मंत्र का जप करने या अनुष्ठान करवाने के लिए कोई जातिगत या लिंগগत भेद नहीं है।
पीड़ित व्यक्ति, उसका कोई परिजन, या कोई सुयोग्य ब्राह्मण (पंडित) संकल्प लेकर इस अनुष्ठान को संपन्न कर सकता है।
रोग-निवारण के मामले में, यदि रोगी स्वयं चिकित्सालय में है या कोमा जैसी अचेतन अवस्था में है, तो कोई अन्य साधक उसके नाम और गोत्र का उच्चारण कर संकल्प ले सकता है और अपने तप का पुण्य उस रुग्ण व्यक्ति के खाते में स्थानांतरित कर सकता है।





