विस्तृत उत्तर
मंत्र से अस्त्र उत्पन्न करना एक अत्यंत गूढ़ और दुर्लभ विद्या थी जो केवल विशेष योग्यता वाले योद्धाओं को ही प्राप्त होती थी।
मूल प्रक्रिया — सर्वप्रथम योद्धा साधारण बाण को धनुष पर चढ़ाता था। फिर मन में उस देवता का ध्यान करता था जिसका अस्त्र चलाना हो। उस देवता का बीज-मंत्र (मूल मंत्र) उच्चारित करते हुए देव का आह्वान किया जाता था। मंत्र की शक्ति से साधारण बाण में उस देव की ऊर्जा प्रतिष्ठित हो जाती थी। बाण छोड़ते समय मंत्र पूर्ण करना होता था।
आवश्यक शर्तें — मन पूर्णतः एकाग्र और शुद्ध होना चाहिए। अहंकार-रहित भाव से देव का स्मरण करना होता था। मंत्र का सही उच्चारण और सही क्रम आवश्यक था। इसीलिए परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया — 'जब जरूरत होगी मंत्र भूल जाओगे।'
राम का उदाहरण — राम ने जयंत पर केवल एक तिनके को ब्रह्मास्त्र के मंत्र से अभिमंत्रित करके चलाया था। इससे स्पष्ट है कि अस्त्र की शक्ति वस्तु में नहीं, मंत्र और भाव में थी।
अस्त्र वापस लेना — जिस मंत्र से अस्त्र चलाया जाता, उससे मिलते-जुलते संहार-मंत्र से अस्त्र वापस बुलाया जाता था।
