विस्तृत उत्तर
प्रेत योनि की सबसे बड़ी विडंबना और कष्ट यह है कि जीवात्मा को अत्यंत तीव्र क्षुधा और पिपासा का अनुभव होता है। मृत्यु के पश्चात स्थूल शरीर नष्ट हो जाता है, परंतु सूक्ष्म शरीर जीवित रहता है। प्रेत को वायव्य प्रधान शरीर प्राप्त होता है, जिसमें भूख-प्यास का अनुभव तो बना रहता है, परंतु मुख, गला और आमाशय जैसे भौतिक अंग न होने के कारण वह भौतिक अन्न या जल ग्रहण नहीं कर पाता। इसी कारण वह घोर पीड़ा, असंतोष और अतृप्ति की अग्नि में जलता हुआ मृत्युलोक में भटकता रहता है।
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