विस्तृत उत्तर
पुरुष अवतार को सृष्टि के आरंभ से जोड़ा गया है। भगवान ने लोकों के निर्माण की इच्छा की और महत्तत्त्व आदि से पुरुष रूप ग्रहण किया। उस पुरुष रूप में दस इंद्रियाँ, एक मन और पाँच भूत, ये सोलह कलाएँ बताई गई हैं। कारण-जल में शयन करते हुए भगवान ने योगनिद्रा का विस्तार किया और उनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ, उसी कमल से प्रजापतियों के अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। भगवान का यही पुरुष रूप, जिसे नारायण कहा गया है, अनेक अवतारों का अक्षय कोष और बीज बताया गया है। इस रूप के छोटे से छोटे अंश से देवता, पशु-पक्षी और मनुष्य आदि योनियों की सृष्टि होती है।
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