विस्तृत उत्तर
सौभाग्य लक्ष्मी उपनिषद स्त्री और पुरुष दोनों की आध्यात्मिक उन्नति और अंतर्निहित शक्ति के जागरण हेतु एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र प्रदान करता है:
'ॐ ह्रीं लक्ष्मी दुर्भाग्या नाशिनी सौभाग्य प्रदायिनी ह्रीं स्वाहा'
इस मंत्र के निरंतर ध्यान और योगिक जप से साधक 'अग्निपूत' (अग्नि के समान पवित्र) और 'वायुपूत' (वायु के समान शुद्ध) हो जाता है।
वह समस्त सांसारिक ऐश्वर्यों (धन, धान्य, गौ, अश्व आदि) का उपभोग करते हुए भी उनमें लिप्त नहीं होता, और अंततः परम पद (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है जहाँ से उसे पुनः लौटना नहीं पड़ता।





