विस्तृत उत्तर
शौनकजी ने यही आश्चर्य पूछा कि शुकदेवजी तो निवृत्तिपरायण, आत्माराम और किसी भी वस्तु की अपेक्षा से रहित थे, फिर उन्होंने इतनी बड़ी भागवत संहिता क्यों सीखी। सूतजी ने उत्तर दिया कि आत्माराम मुनि भी भगवान की अहैतुकी भक्ति करते हैं, क्योंकि भगवान हरि के गुण ही ऐसे मधुर हैं कि वे सबको अपनी ओर खींच लेते हैं। शुकदेवजी भगवान के भक्तों के प्रिय और स्वयं वेदव्यासजी के पुत्र थे। भगवान के गुणों ने उनके हृदय को आकर्षित किया और इसी आकर्षण से उन्होंने इस महान आख्यान का अध्ययन किया। इस प्रकार शुकदेवजी ने भागवत किसी सांसारिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि भगवान के गुणों के आकर्षण और भक्ति के कारण सीखी।
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