विस्तृत उत्तर
विष्णु की प्रथम श्वास और कालचक्र की गति से देश और काल का जाल बना, जिससे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व और अधो दिशाएँ प्रकट हुईं।
विष्णु की श्वास से दिशा कैसे बनी को संदर्भ सहित समझें
विष्णु की श्वास से दिशा कैसे बनी का सबसे सीधा सार यह है: श्वास से देश-काल और दिशाएँ बनीं।
लोक जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
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इसी विषय के 5 प्रश्न
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अष्टमी श्राद्ध में देव तर्पण कैसे अलग है?
देव तर्पण पूर्वमुख, पितृ तर्पण दक्षिणमुख।
वास्तु में नीले रंग का प्रयोग कब करें
पश्चिम दिशा के कमरे, बाथरूम, स्टडी रूम और बेडरूम में हल्का नीला रंग शुभ है। रसोई में नीला न करें। शांति, एकाग्रता और मानसिक सुकून के लिए उपयुक्त।
वास्तु में दर्पण लगाने के नियम कौन से हैं
दर्पण उत्तर या पूर्व दिशा की दीवार पर लगाएँ। दक्षिण और पश्चिम में न लगाएँ। बेडरूम में बिस्तर के सामने न हो। आयताकार/चौकोर आकार शुभ, टूटा दर्पण तुरंत बदलें।
मंत्र जप में दिशा और आसन का चयन कैसे करें?
दिशा: पूर्व=सामान्य, उत्तर=ज्ञान/मोक्ष, दक्षिण=पितृ। आसन: कुश=सर्वोत्तम (गीता 6.11), ऊनी कंबल, रेशम। खुली भूमि=वर्जित (ब्रह्माण्ड पुराण)। रंग: पीला=ज्ञान, लाल=शक्ति, काला=तांत्रिक, श्वेत=शांति।
लक्ष्मी जी की मूर्ति घर में किस दिशा में रखनी चाहिए?
पूर्व/उत्तर मुख। ईशान कोण सर्वोत्तम। गणेश बाईं, लक्ष्मी दाहिनी। विष्णु साथ। शौचालय दीवार से दूर। ऊंचे स्थान। दीपावली: मुख द्वार की ओर।
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