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विस्तृत उत्तर
वितल लोक कर्म-भोग का स्थान इसलिए है क्योंकि यह उन जीवों का लोक है जिन्होंने सकाम पुण्य किए हैं और भौतिक सुखों की तीव्र इच्छा रखी है। यह कर्म-योनि नहीं, भोग-योनि है। यहाँ आत्मा नए आध्यात्मिक कर्मों के लिए नहीं, बल्कि भौतिक ऐश्वर्य, स्वर्ण, संगीत, विलासिता और इंद्रिय सुखों का उपभोग करने आती है। जब पुण्य क्षीण हो जाते हैं, तो आत्मा फिर पृथ्वी लोक पर जन्म लेती है। इसलिए वितल लोक सुख तो देता है, पर शाश्वत शांति और मोक्ष नहीं।
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