विस्तृत उत्तर
राजा जनक ने अपार दहेज दिया — जिसका वर्णन नहीं हो सकता।
चौपाई — 'दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा। अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना॥'
अर्थ — दासी, दास, घोड़े, रथ, हाथी, गायें, वस्त्र और मणि आदि अनेक प्रकारकी चीजें तथा अन्न और सोनेके बर्तन गाड़ियोंमें लदवाकर दहेजमें दिये, जिनका वर्णन नहीं हो सकता।
आगे — 'कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे। गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी' — विचित्र कम्बल, वस्त्र, पटोरे (रेशमी कपड़े), हाथी, रथ, घोड़े, दास, दासी और कामधेनुके समान अलंकृत गायें — सब अपार दहेज में दिये।





