विस्तृत उत्तर
वृंदा का सतीत्व जालंधर के लिए आध्यात्मिक कवच की तरह कार्य करता था। सनातन परंपरा में पतिव्रत धर्म को केवल सामाजिक निष्ठा नहीं, बल्कि तपशक्ति माना गया है। वृंदा अपने पति के प्रति पूर्ण निष्ठावान थी और उसका मन किसी भी प्रकार से विचलित नहीं था। इस तप और निष्ठा से जालंधर के चारों ओर ऐसा अदृश्य रक्षण-कवच बना हुआ था जिसे कोई अस्त्र, शस्त्र या देवशक्ति भेद नहीं पा रही थी। इसलिए जब तक वृंदा का सतीत्व अक्षुण्ण रहा, जालंधर युद्धभूमि में सुरक्षित रहा। उसके पतिव्रत के टूटते ही उसका कवच समाप्त हो गया।
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