विस्तृत उत्तर
भागवत कथा में वक्ता और श्रोता की दिशा के लिये नियम बताया गया है। यदि वक्ता का मुख उत्तर की ओर हो, तो श्रोता पूर्वमुख होकर बैठें। यदि वक्ता पूर्वमुख हो, तो श्रोता उत्तरमुख होकर बैठें। एक विकल्प यह भी है कि वक्ता और श्रोता दोनों पूर्वमुख बैठें। देस-काल आदि को जानने वाले महानुभावों ने श्रोताओं के लिये ऐसा नियम बताया है। इससे स्पष्ट है कि कथा में आसन और दिशा को भी साधारण नहीं माना गया। वक्ता के लिये अलग दिव्य आसन या सिंहासन और श्रोताओं के लिये यथोचित आसन पहले से तैयार करने की बात कही गई है। दिशा का यह विधान कथा-सभास्थल की शुद्ध और अनुशासित व्यवस्था का भाग है।
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