विस्तृत उत्तर
भागवत कथा से पहले पितृ तर्पण शुद्धि-विधान के रूप में बताया गया है। गणेश पूजा के बाद पितरों को तृप्त करने के लिये तर्पण किया जाता है। इसके साथ पूर्व पापों की शुद्धि के लिये प्रायश्चित्त करने का निर्देश भी है। फिर मंडल बनाकर उसमें श्रीहरि की स्थापना की जाती है। इससे कथा आरंभ करने वाले का भाव केवल आयोजन करने का नहीं, बल्कि स्वयं को शुद्ध कर भगवान की कथा के योग्य बनाने का है। पितृ तर्पण, प्रायश्चित्त और हरि स्थापना के बाद श्रीकृष्ण की षोडशोपचार पूजा तथा भागवत पुस्तक की पूजा आगे आती है। इस क्रम से कथा का आरंभ पवित्र, विनम्र और देव-पितृ-सम्मान से युक्त होता है।
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