विस्तृत उत्तर
भागवत सुनने, पढ़ने और मनन से मुक्ति का विधान सीधे कहा गया है। शुकदेवजी बताते हैं कि यह भागवत पुराणों का तिलक और वैष्णवों का धन है। इसमें परमहंसों का निर्मल ज्ञान गाया गया है और ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति सहित निवृत्ति मार्ग प्रकट किया गया है। जो व्यक्ति भक्ति से इसके श्रवण, पठन और विचार-मनन में तत्पर रहता है, वह मुक्त हो जाता है। यहाँ मुक्ति केवल सुन लेने से नहीं, बल्कि भक्ति सहित तीन साधनों से जुड़ी है: कानों से श्रवण, जिह्वा या पाठ से पठन, और बुद्धि-हृदय से मनन। इस प्रकार भागवत ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को जोड़कर जीव को मुक्तिपथ पर ले जाता है।
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