विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में भक्ति के फल कई रूपों में बताए गए हैं। नारदजी कहते हैं कि कलियुग में जो जीव भक्ति से युक्त होंगे, वे पापी होने पर भी निर्भय होकर भगवान श्रीकृष्ण के अभय धाम को प्राप्त होंगे। जिनके हृदय में प्रेमरूपिणी भक्ति निरंतर रहती है, वे शुद्ध अंतःकरण वाले पुरुष स्वप्न में भी यमराज को नहीं देखते। जिनके हृदय में भक्ति महारानी का निवास है, उन्हें प्रेत, पिशाच, राक्षस या असुर स्पर्श करने में भी समर्थ नहीं होते। आगे कहा गया है कि भगवान तप, वेद, ज्ञान या कर्म से नहीं, केवल भक्ति से वश में होते हैं। कलियुग में भक्ति ही सार है और भक्ति से श्रीकृष्ण सामने उपस्थित होते हैं। वर्णन के अंत भाग में सनकादि कहते हैं कि श्रीमद्भागवत के प्रभाव से प्रेमरस बहाने वाली भक्ति ज्ञान और वैराग्य के साथ घर-घर और जन-जन के हृदय में क्रीड़ा करेगी। इसलिए भक्ति से कृष्ण-प्राप्ति, निर्भयता, रक्षा, मुक्ति और अंतःकरण की शुद्धि मिलती है।
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